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Saturday, December 5, 2009

लुधियाना को लगा मुंबई का रोग

एक मजदूर की पिटाई करते स्थानीय लोग और पुलिसवाले।

लुधियाना में हुई हिंसा का यह फोटो आज एक अखबार में छपा है। फोटो यह बताने के लिए काफी है कि 'दिल देने और दिल लेने में नंबर वन' पंजाबियों के दिलों में प्रवासी मजदूर समुदाय के प्रति सिर्फ २४ घंटे के भीतर पुलिस-प्रशासन ने कितनी नफरत भर दी और उन्हें एक-दूसरे की जान का दुश्मन बना दिया।
बात सिर्फ इतनी-सी थी कि बाहर से आए मजदूर, जो मुख्य रूप से बिहार या पूर्वी उत्तर प्रदेश के हैं, आए दिन यहां बाइकर्स गैंग की लूट का शिकार हो रहे है। डरे-सहमे ये मजदूर अमूमन तो पुलिस के पास इसकी शिकायत करने की ही हिम्मत ही नहीं जुटा पाते थे, अगर गाहे-बगाहे थाने पहुंच भी जाते थे तो पुलिस उन्हें मार-पीट कर भगा देती थी। पराए प्रदेश में लंबे समय से असुरक्षा बोध के तले जी रहे मजदूर समुदाय का धैर्य बृहस्पतिवार को जवाब दे गया और वे सड़कों पर उतर आए। उनका मकसद नेक था, वे बस इतना चाहते थे कि पुलिस-प्रशासन उनके खून-पसीने की कमाई पर डाका डालने वालों को काबू में करे। पुलिस ने अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए इसे स्थानीय बनाम प्रवासी मजदूरों का रंग दे दिया। फिर क्या था जो पंजाबी मेहमाननवाजी के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हैं, उनमें से कई के हाथों में दूसरे प्रदेश के लोगों को मारने के लिए हथियार थे। ऐसा करते वक्त उन्होंने यह नहीं सोचा कि क्या होगा पंजाब का। अगर मुंबई और महाराष्ट्र की नफरत यहां भी फैल गई तो लुधियाना की इंडस्ट्री और पंजाब की खेतीबारी की रीढ़ टूट जाएगी।

मजदूर वहां किस तरह से लूट का शिकार हो रहे हैं, इसे स्थानीय अखबार में छपी पटना के मजदूर राम कुमार की कहानी के जरिए भी समझा जा सकता है। काम की तलाश में पटना से लुधियाना आया था। उसने तीन साल लुधियाना की एक फैक्टरी में नौकरी की और इस दौरान वह चार बार लुटा। तीन बार वह शिकायत करने की हिम्मत नहीं कर सका। दो-तीन महीनों में वह जितना कमाता था, किसी न किसी रात लुटेरे घात लगाकर उससे लूट लेते। राम कुमार ने बेटी की शादी के लिए कुछ हज़ार रुपये जोड़े थे, वह भी लुटेरों ने छीन लिए। निराश होकर राम कुमार ने लुधियाना से मुंह मोड़ लिया और यहां दोबारा न आने की कसम खाकर पटना लौट गया कि बेटी की शादी हो या न हो, वह पटना में ही काम करेगा।

राम कुमार जैसे कई मजदूर जो रोजी-रोटी और परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए बिहार से पंजाब तक का सफर तय कर रहे थे, अब उनके कदम ठिठकने लगे हैं। कई तो पंजाब से अपने घर आने के बाद वहां लौटने की भी नहीं सोच रहे हैं। उनकी मनोदशा को जताने के लिए दुष्यंत कुमार की ये पक्तियां काफी हैं...
कहां तो तय था चराग़ां हर एक घर के लिए
कहां चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए
यहां दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहां से चले और उम्र भर के लिए

और अगर पलायन का सिलसिला चल पड़ा, तो यकीन मानिए पंजाबियत ही शर्मसार होगी।