ज्यादा दिन नहीं हुआ है जब मीडिया और बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका कह रहा था कि आतंकवाद को इस्लाम से जोड़कर न देखा जाए। आतंकवादियों को कोई मजहब नहीं होता है। वैसे यहां तक तो मैं भी मीडिया और बुद्धिजीवियों की राय से सहमत हूं। लेकिन ये सारे तर्क और विवेकपूर्ण बातें धरी रह गईं जब मालेगांव और साबरकांठा विस्फोट में हिंदू आरोपी बनाए गए। कल तक चीख-चीखकर संयमी और विवेकी बनने की नसीहत देने वाले लोग अब अपना उपदेश ही भूल गए हैं। अब उसी मीडिया में हेडिंग लगा रही है- Millitant Hindu activists held for malegaon blasts. कुछ और सुर्खियां हैं - Hindu group behind Malegaon, Modasa Ramzan blast, Hindu terror link to malegaon blast.इन धमाकों की साजिश करनेवाले अगर हिंदू हैं, तो दूसरे मामलों की तरह ही कानून अपना काम करेगा और सजा देगा। इसमें 'दूसरे संप्रदाय' के विपरीत हिंदुओं को कोई आपत्ति भी नहीं होगी। आरोपियों का नाम सामने आते ही 'हिंदू हितों के पैरोकारों' ने आगे आकर सराहनीय बयान दिया है। इसके बावजूद मीडिया और बुद्धिजीवियों के उस बड़े तबके का आतंकवाद व धर्म के संबंध पर सुर बदल गए हैं, पर सवाल उठता है क्यों? शायद इसके पीछे भी वही मानसिकता है कि बहुसंख्यकों की भावनाओं से जब चाहो खिलवाड़ कर लो, परवाह कौन करता है।